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अध्याय 25 — पञ्चविंशतितम अध्याय

शिवभारतम्
25 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - रुस्तमखान प्रभृतियों को पराजित करके अपनी श्वेत कीर्ति को फैलाकर, अल्लीशाह के प्रदेश को जल्दी वश में करने के लिए सेनापति के साथ एक बड़ी सेना को भेजकर स्वयं शिवाजी फिर से पन्हाळगड़ के पर्यवेक्षण करने के लिए गया।
महाविख्यात उस सेनापति ने शिवराज की आज्ञा पाकर आदिलशाह के उस प्रदेश को हां हां बोलते हुए कब्जे में कर लिया।
कवठ, बोरगांव, गालगांव, कुण्डल, घोगांव, सतीकीर आडभिरज, ओकाक, दोदवाड, मुरवाड़, घारवाड़ का बड़ा किला, क्षुन्द्रवंद्यपुर, श्यामगांव, माथिल, पारगांव, सांगली, काणद, कुरुन्दवाड़ी, कागल, हेबाज, हनुवल्ली, हूणवाड, रायबाग, हुकेरी, कांडगांव, हकदी, धुणिका, किणी, अरग तेलसंग केरुर, अंबुप, कमलापूर, अथली तिकोटे, यें और बड़े नगर व पुरीयों को जीतकर उस विजयी नेताजी ने अपने कब्जे में किए।
इस प्रकार से वह देश नष्ट हो गया। बहुत से सैनिक मृत्यु को प्राप्त हो गए, पन्हाळ आदि किल्ले शत्रूओं के वश में हो गये तुरन्त बुलाने पर भी मुगलों ने विलम्ब किया, इस कारण प्रतिदिन दुःखी होता हुआ एवं संकटरुपी समुद्र में डुबते हुए की अल्ली आदिलशाह ने कर्णल के राजा शिद्दी जोहर को बुलाकर शिवाजी राजा को पकड़ने के लिए तुरन्त भेद दिया।
तब वह पराक्रमी मुखिया अपने जाती के कई हजार घुड़सवार, पर्वत के समान विशाल अनगिनत हाथी एवं शक्तिशाली कर्नाटकी पदैल सेना के साथ शिवाजी के अधिकृत पन्हाळ के किले में आया।
पहले पराजय को प्राप्त होने के कारण, रुस्तम एवं फाजल दोनों ही आदिलशाह की आज्ञा पाकर फिर से अपनी सेना के साथ, समानगुणों, समान व्यवहार व हमेशा मिलकर शीघ्रता से आगे जाने वाले उस जोहर से जा के मिले।
बाजराज घोरपड़े कर्णाटक का पीडनायक, वल्लीखान का पुत्र अजेय भाईखान, शिद्दी मसूद और दूसरे सरदार आदिलशाह की आज्ञा से पन्हाळ को प्राप्त करने के लिए शिद्दी जोहर के निकट आ गये।
उसके बाद वह जोहर, फाजल एवं रुस्तम इन रणधीर सरदारों ने अपने-अपने घुड़सवारों एवं बड़े खानादि और पदाति सैन्यसमूह के सेनापति के साथ, पूर्व की ओर से पन्हाळ के किले को घेर लिया।
सादात, मसूद, क्षत्रिय बाजराज और भायीखानादि अन्य सरदारों ने अपने-अपने सैनिकों के साथ और पराक्रमी पीड़नायक ने चमकती हुई ढाल, लाठी, कर्णाटक की लाठीवाले और हमला करने के लिए उत्सुक ऐसे अन्य बन्दूक को धारण किए हुए पदाति सैनिको के साथ पन्हाळगड़ को पश्चिम की ओर से घेरा।
अन्य सैनिकों ने जोहर की आज्ञा से उस किले को दक्षिण एवं उत्तर की और से घेर लिया।
ऊंचे किले पर शिवाजी एवं किले के नीचे जोहर फिर भी वह युद्ध भारतीय युद्ध के समान हुआ।
वह शिद्दी राजा के साथ बहुत महिनों तक युद्ध करता रहा, फिर भी हर बार पराजित होने के कारण उसको यश नहीं मिला।
इस प्रकार से कथन करने वाले, श्रीविष्णु के चरणकमलों के आनन्द से परिपूर्ण शिवाजी के यशरूपी सोमरस से चित्त हर्षाकुल हो गया है जिसका ऐसे कांशी में रहने वाले निष्पापी ब्राह्मण श्रेष्ठ विद्वानों ने कवीन्द्र से पूछा।
पंडित बोलें - अल्ली आदिलशाह ने अपना दूत भेजकर युद्ध में गर्व से लड़ने वाली दिल्लीपति की जो सेना बुलाई है, वह कितनी थी, उसका नायक कौन था? वह किस यान से कहां आया, उन्होंने कौन-सा कार्य आरम्भ किया और शिवाजी ने उसका कैसे प्रतीकार किया। यह सब हे बुद्धिमान परमानन्द बताओ।
कवीन्द्र बोले - शिवाजी महाराज का उत्थान एवं अपना पतन देखकर उत्कृष्ट सहायता करने वाला मिल जाए इसलिए आदिलशाह तो दिल्ली की ओर से सैनिक बुलाने पर भी शरणागतों की रक्षा करने में तत्पर एवं जिसने हजारों युद्ध में विजय पायी है, ऐसे दिल्ली के राजा हमारा मामा पराक्रमी शाएस्तेखान के सेनापतित्व में देवगिरी किले के तलहटी में अपनी सामर्थ्यशाली व बड़ी सेना के साथ जल्दी से जाने की आज्ञा दी।
उसके बाद स्वामी की आज्ञा के अनुसार चलने वाली बहुत से सेनापति सुन्दर रूप से तैयार होकर शाएस्तेखा के नेतृत्व में चले पड़े।
प्रसिद्ध पराक्रमी एवं मानी शमसखान पठाण, जाफरखान का पुत्र दुर्जयी नामदार, वैसे ही गयासुदीखान, हसन मुनीम सुतान मिर्जा, प्रतापी मनचेहर, तुरुकताज, क्रूर कुबाहत और हौदखान, उझबेग ये तीनों युद्धोत्सुक, इमाम विरुदीखान एवं दुर्जयी लोदीखान ये दोनों पठाण, वैसे ही दोनों दिलावर मौलव, अब्दुल वेग, प्रसिद्ध खोजा भंगड़, जोहर, पराक्रमी खोजा सुल्तान, युद्धविशारद सिद्दी फते एवं फतेजंग, क्रोधी कारतलब, गाजीखान आदि सरदार, शत्रुशल्य का पुत्र पराक्रमी भावसिंह, उनके भाई किशोरसिंह एवं रामसिंह ये दोनों राजा, राजा गिरिधर मनोहर, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, पांचवा पुरुषोत्तम एवं गोवर्धन ऐसे छः गौड़वंशीय शत्रुविनाशक श्रेष्ठ क्षत्रिय राजा, गौड़ विठ्ठलदास का सूर्य के समान तेजस्वी पोता, अर्जुन का पुत्र विजयी राजा राजसिंह, ये तीनों सिसोद वंश के राजा, चन्द्रवंत वंश के राजा श्री अमर सिंह, चन्द्रपूर के राजा का सेनापति अरिंदम द्वारकाजित्, जिवाजी, परसोजी, बालाजी, शरीफ राजा का पुत्र युद्धोत्सुक त्र्यम्बक ये सब पराक्रमी व महाबलुशली, भोसले, त्र्यम्बक, अनंत एवं दत्त ये तीनों खंडार्ग का वंश के दत्त और करतुग ये यादववंशी, सर्वाजी का पुत्र शत्रुवीत्थ रंभाजी पवार, युद्ध में शेरनी के समान निर्भयी उदयराम की पत्नी जगतजीवन की माता, रायशेरणी, नाम से प्रसिद्ध, बड़े प्रताप के कारण अप्रतिध्वणित स्त्री एवं उसका कृष्णराज, प्रचंड आदि भाई, सर्जेराव घाटगे, कमलाजी गाढे, जसवंतराव एवं कमलाजी कोकाटे, ये सभी बलशाली, सरदार दिल्लीपति की आज्ञा से अपनी सेना के साथ शाएस्तेखान के पीछे-पीछे गए।
उन सैनिकों ने अपने चारों ओर के भी मार्ग की नदियां ऐसी सूखा दी कि वे नदियां अपने पति समुद्र से वर्षा ऋतु तक मिल ही न पाये।
उसके बाद दृढ शासक, सेनापति शाएस्ताखान सतत्तर हजार घुड़सवार, पर्वत के समान भद्र जाती के मदमस्त हाथी, बक्सर जाती के उत्तम प्रमुख पदाति सैनिकों के साथ सभी प्रकार की युद्धसामग्री के साथ सज्ज हतोत्साहित शत्रु के प्रदेश की सीमा भीमा नदी के समीप पहुंच गया।
तदनन्तर मन्दिरों का विध्वंस किया, छोटे बड़े मठ छिन्न-भिन्न कर दिए, अधिकारियों के घर मिट्टी में मिला दिए, बगीचों के वृक्ष तोड़ दिए, बहुत से पुराने गांव व नगर सुनसान कर दिए, सब जगह घूमने वाले मुसलमान सैनिकों ने नदीतट भ्रष्ट कर दिए, इस प्रकार वह भूप्रदेश आकाश में चन्द्रग्रहण के समान भयानक दिखने लगा।
उसके बाद अशांत समुद्र के समान उस सेना ने शीघ्रता से चाकणप्रान्त को भयभीत किया।
शिवाजी महाराज के पन्हाळ के किले पर रहते हुए मुगलों ने चाकण के किले को क्रोध से घेर लिया।
उस संग्राम दुर्ग में रहने वाले शिवाजी के सैनिक बहुत दिनों तक संघर्ष करते रहे।
जब तक क्रोधी शिवाजी राजा पन्हाळ के किले पर बलशाली जोहर से युद्ध करते हैं, तब तक हम सब मिलकर चाकणप्रान्त में क्रमशः लड़ेंगे, ऐसी किल्ले में रहने वालों की इच्छा जानकर शाएस्ताखान को अच्छा नहीं लगा।
दिल्लीपति राजा की बड़ी व प्रसिद्ध सामर्थ्यशाली सेना उस संग्रामदुर्ग पर संघर्ष कर रही है, ऐसा सुनकर अल्लीशाह के चित्त को थोड़ा धैर्य प्राप्त हुआ, उसने भी विजापुर से जोहर को अत्यन्त क्रोध में लिखा कि सावधान रहकर पन्हाळ किले के शत्रु को दृढ़ता से बंदी बनाए रखें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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