यावद्युध्यति जोहरेण बालना क्रुद्धः प्रणालाचले, राजा तावदमी वयं समुदिताचक्रावतीमण्डले । योत्स्यामः प्रतियोधिभिः प्रतिपदं दुर्गस्थितानामिदम् । विज्ञायाभिमतं तथा न विदधे शास्तापि शस्तं मनः ॥
जब तक क्रोधी शिवाजी राजा पन्हाळ के किले पर बलशाली जोहर से युद्ध करते हैं, तब तक हम सब मिलकर चाकणप्रान्त में क्रमशः लड़ेंगे, ऐसी किल्ले में रहने वालों की इच्छा जानकर शाएस्ताखान को अच्छा नहीं लगा।
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