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अध्याय 1 — कामगीता
कामगीता
21 श्लोक • केवल अनुवाद
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - भारत! केवल राज्य आदि बाह्य पदार्थों का त्याग करने से ही सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शारीरिक द्रव्य का त्याग करके भी सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नहीं भी होती है।
बाह्य पदार्थों से अलग होकर भी जो शारीरिक सुख-विलास में आसक्त है, उसे जिस धर्म और सुख की प्राप्ति होती है, वह तुम्हारे साथ द्वेष करने वालों को ही प्राप्त हो।
'मम' (मेरा) ये दो अक्षर ही मृत्युरूप हैं और 'न मम' (मेरा नहीं है) यह तीन अक्षरों का पद सनातन ब्रह्म की प्राप्ति का कारण है। ममता मृत्यु है और उसका त्याग सनातन अमृतत्व है।
राजन्! इस प्रकार मृत्यु और अमृत दोनों अपने भीतर ही स्थित हैं। ये दोनों अदृश्य रहकर प्राणियों को लड़ाते हैं अर्थात् किसी को अपना मानना और किसी को अपना न मानना यह भाव ही युद्ध का कारण है, इसमें संशय नहीं है।
भरतनन्दन! यदि इस जगत की सत्ता का विनाश न होना ही निश्चित हो, तब तो प्राणियों के शरीर का भेदन करके भी मनुष्य अहिंसा का ही फल प्राप्त करेगा।
चराचर प्राणियों सहित समूची पृथ्वी को पाकर भी जिसकी उसमें ममता नहीं होती, वह उसको लेकर क्या करेगा अर्थात् उस सम्पत्ति से उसका कोई अनर्थ नहीं हो सकता।
किंतु कुन्तीनन्दन! जो वन में रहकर जंगली फल-मूलों से ही जीवन-निर्वाह करता है, उसकी भी यदि द्रव्यों में ममता है तो वह मौत के मुख में ही विद्यमान है।
भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओं के स्वभाव को देखिये-समझिये (ये मायामय होने के कारण मिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिये)। जो मायिक पदार्थो को ममत्व की दृष्टि से नहीं देखता, वह महान् भय से छुटकारा पा जाता है।
जिसका मन कामनाओं में आसक्त है, उसकी संसार के लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति बिना कामना के नहीं होती और समस्त कामनाएँ मन से ही प्रकट होती हैं। विद्वान् पुरुष कामनाओं को दु:ख का कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं।
योगी पुरुष अनेक जन्मों के अभ्यास से योग को ही मोक्ष का मार्ग निश्चित करके कामनाओं का नाश कर डालता है। जो इस बात को जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म,
व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान-योगादि का कामनापूर्बक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्म से वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है। वास्तव में कामनाओं का निग्रह ही धर्म है और वही मोक्ष का मूल है।
युधिष्ठिर! इस विषय में प्राचीन बातों के जानकार विद्वान् एक पुरातन गाथा का वर्णन किया करते हैं, जो कामगीता कहलाती है। उसे मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये। काम का कहना है कि कोई भी प्राणी वास्तविक उपाय (निर्ममता और योगाभ्यास) का आश्रय लिये बिना मेरा नाश नहीं कर सकता है।
जो मनुष्य अपने में अस्त्रबल की अधिकता का अनुभव करके मुझे नष्ट करने का प्रयत्न करता है, उसके उस अस्त्र-बल में मैं अभिमानरूप से पुन: प्रकट हो जाता हूँ।
जो नाना प्रकार की दक्षिणा वाले यज्ञों द्वारा मुझे मारने का यत्न करता है, उसके चित्त में मैं उसी प्रकार उत्पन्न होता हूँ, जैसे उत्तम जंगम योनियों में धर्मात्मा।
जो वेद और वेदान्त के स्वाध्यायरूप साधनों के द्वारा मुझे मिटा देने का सदा प्रयास करता है, उसके मन में मैं स्थावर प्राणियों में जीवात्मा की भाँति प्रकट होता हूँ।
जो सत्यपराक्रमी पुरुष धैर्य के बल से मुझे नष्ट करने की चेष्टा करता है, उसके मानसिक भावों के साथ मैं इतना घुल-मिल जाता हूँ कि वह मुझे पहचान नहीं पाता।
जो कठोर ब्रत का पालन करने वाला मनुष्य तपस्या के द्वारा मेरे अस्तित्व को मिटा डालने का प्रयास करता है, उसकी तपस्या में ही मैं प्रकट हो जाता हूँ।
जो विद्वान् पुरुष मोक्ष का सहारा लेकर मेरे विनाश का प्रयत्न करता है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसी से वह बँधा हुआ है। यह विचारकर मुझे उस पर हँसी आती है और मैं खुशी के मारे नाचने लगता हूँ। एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियों के लिये अवध्य एवं सदा रहनेवाला हूँ।
अत: महाराज! आप भी नाना प्रकार की दक्षिणा वाले यज्ञों द्वारा अपनी उस कामना को धर्म में लगा दीजिये। वहाँ आपकी वह कामना सफल होगी।
विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अश्वमेध का तथा पर्याप्त दक्षिणा वाले अन्यान्य समृद्धिशाली यज्ञों का अनुष्ठान कीजिये। अपने मारे गये भाई-बन्धुओं को बारम्बार याद करके आपके मन में व्यथा नहीं होनी चाहिये। इस समरांगण में जिनका वध हुआ है, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते।
इसलिये आप पर्याप्त दक्षिणा वाले समृद्धिशाली महायज्ञों का अनुष्ठान करके इस लोक में उत्तम कीर्ति और परलोक में श्रेष्ठ गति प्राप्त करेंगे।
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