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कामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 9
कामात्मानं न प्रशंसन्ति लोके नेहाकामा काचिदस्ति प्रवृत्तिः । सर्वे कामा मनसोऽङ्ग प्रभूता यान्पण्डितः संहरते विचिन्त्य ॥
जिसका मन कामनाओं में आसक्त है, उसकी संसार के लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति बिना कामना के नहीं होती और समस्त कामनाएँ मन से ही प्रकट होती हैं। विद्वान्‌ पुरुष कामनाओं को दु:ख का कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं।
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