जिसका मन कामनाओं में आसक्त है, उसकी संसार के लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति बिना कामना के नहीं होती और समस्त कामनाएँ मन से ही प्रकट होती हैं। विद्वान् पुरुष कामनाओं को दु:ख का कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं।
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