अथवा वसतः पार्थ वने वन्येन जीवतः ।
ममता यस्य वित्तेषु मृत्योरांस्ये स वर्तते ॥
किंतु कुन्तीनन्दन! जो वन में रहकर जंगली फल-मूलों से ही जीवन-निर्वाह करता है, उसकी भी यदि द्रव्यों में ममता है तो वह मौत के मुख में ही विद्यमान है।
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