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कामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 18
यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डितः । तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च । अवध्यः सर्वभूतानामहमेकः सनातनः ॥
जो विद्वान्‌ पुरुष मोक्ष का सहारा लेकर मेरे विनाश का प्रयत्न करता है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसी से वह बँधा हुआ है। यह विचारकर मुझे उस पर हँसी आती है और मैं खुशी के मारे नाचने लगता हूँ। एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियों के लिये अवध्य एवं सदा रहनेवाला हूँ।
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