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कामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 20
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता । अन्यश्च विविधैर्यज्ञैः समृद्ध्यैराप्तदक्षिणैः ॥ मा ते व्यथाऽस्तु निहतान्बन्धून्वीक्ष्य पुनःपुनः । न शक्यास्ते पुनर्द्रष्ट्रं येऽहतास्मिन्रणाजिरे ॥
विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अश्वमेध का तथा पर्याप्त दक्षिणा वाले अन्यान्य समृद्धिशाली यज्ञों का अनुष्ठान कीजिये। अपने मारे गये भाई-बन्धुओं को बारम्बार याद करके आपके मन में व्यथा नहीं होनी चाहिये। इस समरांगण में जिनका वध हुआ है, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते।
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