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कामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 11
व्रतं यज्ञान्नियमान्ध्यानयोगान्कामेन यो नारभते विदित्वा । यद्यच्चायं कामयते स धर्मो नयो धर्मो नियमस्तस्य मूलम् ॥
व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान-योगादि का कामनापूर्बक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्म से वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है। वास्तव में कामनाओं का निग्रह ही धर्म है और वही मोक्ष का मूल है।
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