ब्राह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत ।
यन्न पश्यति तद्भूतं मुच्यते स महाभयात् ॥
भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओं के स्वभाव को देखिये-समझिये (ये मायामय होने के कारण मिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिये)। जो मायिक पदार्थो को ममत्व की दृष्टि से नहीं देखता, वह महान् भय से छुटकारा पा जाता है।
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