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कामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 4
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ । अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥
राजन्‌! इस प्रकार मृत्यु और अमृत दोनों अपने भीतर ही स्थित हैं। ये दोनों अदृश्य रहकर प्राणियों को लड़ाते हैं अर्थात्‌ किसी को अपना मानना और किसी को अपना न मानना यह भाव ही युद्ध का कारण है, इसमें संशय नहीं है।
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