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अध्याय 7 — सप्तमोपदेश
घेरण्ड संहिता
23 श्लोक • केवल अनुवाद
समाधि का श्रेष्ठयोग बहुत भाग्य से प्राप्त होता है। गुरु कृपा प्रसाद से और गुरुभक्ति से यह प्राप्त होता है।
जिसे विद्या में प्रतीति हो, स्वगुरु में प्रतीति हो, आत्मा में भी प्रतीति हो और मन का प्रबोध हो और दिन-दिन जिसे यह होता है, वही सुन्दर अभ्यास को प्राप्त होता है।
शरीर से भिन्न मन को करके परमात्मा में एकाकार करके समाधि को जानना चाहिये। (इस प्रकार) दशादि अवस्थाओं से मुक्त होता हैं।
मैं ही ब्रह्म हूँ, अन्य कुछ नहीं हूँ। में ब्रह्म हूँ, न कि शोकादि का भागी हूँ। में नित्यमुक्त स्वभाववाला सच्चिदानन्द स्वरूपात्मा हूँ।
(समाधि के भेद कहते हैं) शांभवी, खेचरी, भ्रामरी और योनि, ये चार मुद्रायें हैं, जो ध्यान, नाद, रसानन्द, और लयसिद्धि में (क्रमश: धारण करनी चाहिये)।
भक्तियोग पाँच प्रकार का है। तथा मनोमूर्च्छा छह प्रकार की है, जो राजयोग कही जाती है। इसमें भी प्रत्येक का धारण करना चाहिये।
(ध्यान योग समाधि बताते हैं-) शांभवी मुद्रा को करके आत्मा का प्रत्यक्ष करना चाहिये। बिन्दुब्रह्म को एकबार देखकर वहाँ मन को नियोजित करे।
आत्मा को आकाशस्थ (ब्रह्मरंध्र के अन्दर) करे और आत्मा के मध्य में आकाश को धारण करे। आत्मा को आकाशरूप करके किसी से भी बँधता नहीं है। सदा आन्नदमय होकर मनुष्य समाधिस्थ हो जाता है।
(नादयोग समाधि की विधि कहते हैं-) खेचरी मुद्रा के साधन से जिह्वा को ऊपर ले जाये। साधारण क्रियायें समाप्त होकर समाधि की सिद्धि हो जाती है।
(रसानंद समाधिविधि कहते हैं-) वायु को मन्द गति से लेकर भ्रामरी कुम्भक करे। वायु मंदगति से विचरे, तब भ्रमर जैसा नाद होता है।
तब अंतस्थ भ्रामरी नाद को सुनकर वहाँ मन को लगाये, इससे समाधि लग जाती है और वहाँ आनन्द 'वही मैं हूँ' इस प्रकार से होता है।
(लयसिद्धि समाधिविधि कहते हैं-) योनिमुद्रा को करके स्वयं को शक्तिमान बनाये। श्रंगाररूप रस से परमात्मा में विहार करे।
आन्नदमय होकर ब्रह्म में ऐक्यभाव हो जाये। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार की अद्वैत समाधि हो जाती है।
(भक्तियोग समाधिविधि बताते हैं-) अपने हृदय में इष्टदेव के स्वरूप का ध्यान करे। भक्तिपूर्वक परंआह्वाद का चिन्तन करे।
(भक्तियोग में) आनन्द के अश्रुओं से हृदय पुलकित हो जाता है तथा भावपूर्ण दशा हो जाती है। उसी से समाधि होती है, तथा मन उन्मन हो जाता है।
मनोमूर्च्छा को करके मन को आत्मा में लगाये, तब परमात्मा के योग से समाधि को प्राप्त करना चाहिये।
हे चण्ड! इस प्रकार मुक्ति का लक्षण समाधि योग मेरे द्वारा कहा गया। राजयोग समाधि, उन्मनी, सहजावस्था और एकात्मवाचक योग आत्मैक्य होकर ही करना चाहिये।
जल में विष्णु हैं, स्थल में विष्णु हैं, और पर्वत के मस्तक पर विष्णु हैं, अग्नि ज्वालाओ में विष्णु है और सब विष्णुमय ही है।
भूचर, खेचर और जितने भी जीव जन्तु हैं, वृक्ष, गुल्म, बेल, लता, तृणादि जल और पर्वत सबको ब्रह्म जाने और आत्मा में ही देखे।
घटस्थ (शरीरस्थ) आत्मा चैतन्य है, अद्वैत है, शाश्वत है और पर है। इस शरीर से अलग मानने से मनुष्य वीतराग और वासनारहित हो जाता है।
इस प्रकार सब संकल्पों से वर्जित समाधिविधि होती है। देह, पुत्र, स्त्री, आदि बान्धवों में, धनों में सबमें ममतारहित होकर समाधि को जानना (पाना) चाहिये।
यह गोपनीय तत्व (लयामृत रूप) शिव द्वारा विधिपूर्वक बहुत प्रकार से कहा गया है। उसे संक्षेप में लेकर मुक्तिरूप लक्षण कहा गया है।
इस प्रकार हे चण्ड! यह परं दुर्लभ समाधि का विषय बताया गया, जिसे जानकर भूमि पर पुनर्जन्म नहीं होता है।
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