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घेरण्ड संहिता • अध्याय 7 • श्लोक 10
अनिलं मन्दवेगेन भ्रामरीकुम्भकं चरेत्‌ । मन्दं मन्दं रेचयेद्वायुं भृङ्गनादं ततो भवेत्‌ ॥
(रसानंद समाधिविधि कहते हैं-) वायु को मन्द गति से लेकर भ्रामरी कुम्भक करे। वायु मंदगति से विचरे, तब भ्रमर जैसा नाद होता है।
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