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घेरण्ड संहिता • अध्याय 7 • श्लोक 11
अन्तःस्थं भ्रामरीनादं श्रुत्वा तत्र मनो नयेत्‌ । समाधिर्जायते तत्र आनन्दः सोऽहमित्यतः ॥
तब अंतस्थ भ्रामरी नाद को सुनकर वहाँ मन को लगाये, इससे समाधि लग जाती है और वहाँ आनन्द 'वही मैं हूँ' इस प्रकार से होता है।
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