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घेरण्ड संहिता • अध्याय 7 • श्लोक 20
आत्मा घटस्थचेतन्यमद्वैतं शाश्वतं परम्‌ । घटादिभिन्नतो ज्ञात्वा वीतरागं विवासनम्‌ ॥
घटस्थ (शरीरस्थ) आत्मा चैतन्य है, अद्वैत है, शाश्वत है और पर है। इस शरीर से अलग मानने से मनुष्य वीतराग और वासनारहित हो जाता है।
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