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घेरण्ड संहिता • अध्याय 7 • श्लोक 15
आनन्दाश्रुपुलकेन दशाभाव: प्रजायते । समाधि: सम्भवेत्तेन सम्भवेच्च मनोन्मनी ॥
(भक्तियोग में) आनन्द के अश्रुओं से हृदय पुलकित हो जाता है तथा भावपूर्ण दशा हो जाती है। उसी से समाधि होती है, तथा मन उन्मन हो जाता है।
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