विद्याप्रतीतिः स्वगुरुप्रतीतिरात्मप्रतीतिर्ममसः प्रबोधः ।
दिने दिने यस्य भवेत् स योगी सुशोभनाभ्यासमुपैति सद्यः।।
जिसे विद्या में प्रतीति हो, स्वगुरु में प्रतीति हो, आत्मा में भी प्रतीति हो और मन का प्रबोध हो और दिन-दिन जिसे यह होता है, वही सुन्दर अभ्यास को प्राप्त होता है।
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