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घेरण्ड संहिता • अध्याय 7 • श्लोक 8
खमध्ये कुरु चात्मानं आत्ममध्ये च खं कुरु । आत्मानं खमयं दृष्ट्वा न किञ्चिदपि बाधते । सदानन्दमयो भूत्वा समाधिस्थो भवेन्नरः ॥
आत्मा को आकाशस्थ (ब्रह्मरंध्र के अन्दर) करे और आत्मा के मध्य में आकाश को धारण करे। आत्मा को आकाशरूप करके किसी से भी बँधता नहीं है। सदा आन्नदमय होकर मनुष्य समाधिस्थ हो जाता है।
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