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अध्याय 74 — अथ स्त्रीप्रशंसाध्यायः
बृहत्संहिता
20 श्लोक • केवल अनुवाद
जये धरित्र्याः पुरमेव सारं पुरे गृहं सद्यनि चैकदेशः । तत्रापि शय्या शयने वरा स्त्री रोज्ज्वला राज्यसुखस्य सारः ॥
खी रत्नों कोखी रत्नों को भूषित करती है; किन्तु रत्नकान्ति से खी नहीं भूषित होती; क्योंकि रत्नरहित खी भी चित्त को हर लेती है, किन्तु खी के अंग-संग के विना रत्न चित्त को नहीं हर सकता है।
सुख, भय, हर्ष आदि आकार को छिपाते हुये, शत्रु की सेना को जीतने के लिये प्रयत्न करते हुये, किये न किये सैकड़ों व्यापारों की शाखाओं से व्याकुल तन्त्रों को विचार करते हुये, मन्त्रियों द्वारा कथित नीति का सेवन करते हुये, पुत्र आदि से भी शङ्कित रहते हुये, दुःखार्णव में निमग्न राजाओं के लिये स्त्री का आलिङ्गन मात्र थोड़ा- सा ही सुख होता है।
संसार में कहीं पर भी बद्या ने लियों के अतिरिक्त ऐसा कोई रान नहीं बनाया, जिसके सुनने, स्पर्श करने, देखने या स्मरण करने से ही आनन्द प्राप्त हो सके। लोग की के लिये धर्म और अर्थ की सेवा करते हैं। स्त्री के द्वारा पुत्रसुख तथा विषयमुख मिलता है तथा स्त्री ही गृह में लक्ष्मी होती है। अतः मान तथा विषयों के द्वारा ती का सदा आदर करना चाहिये।
जो कोई भी (व्यक्ति) वैराग्य मार्ग के द्वात्रियों में गुजों को छोड़कर दोषों का वर्णन करते हैं, वे दुर्जन हैं मेरा अनुमान है। इसलिये दुर्जनों के नहीं हो सकते हैं।
खियों में ऐसा कौन दोष है, जिसको पुरुषों ने पहले नहीं किया अर्थात् पहले पुरुषों ने सभी दोष किये, तत्पश्चात् उन्हीं से खियों ने सीखे। पुरुषों ने अपनी धृष्टता से खियों को जीत लिया; क्योंकि पुरुषों से खियों में अधिक गुण होते हैं। ऐसा ही मनु द्वारा भी कहा गया है।
चन्द्रमा ने पवित्रता, गन्धों ने शिक्षित वचन और अग्नि ने सर्वभक्षित्व खियों को दिया है, इसलिये खियाँ सुवर्णतुल्य होती हैं।
ब्राह्मण पाँव से, गौ पृष्ठ से और बकरा तथा घोड़ा मुख से पवित्र होता है, किन्तु त्रियाँ अपने समस्त अंगों से पवित्र होती है।
लियों के समान कोई अन्य वस्तु पवित्र नहीं है, कभी भी वे दोषयुक्त नहीं होती; क्योंकि प्रत्येक मास में लवित होने वाला उनका रज उनके पापों का हरण कर लेता है।
असम्मानित कुलखियाँ जिन गृहों को शाप देती हैं, कृत्या से हत की तरह चारो तरफ से वे गृह नष्ट हो जाते हैं।
मनुष्यों की उत्पत्ति श्री से ही होती है अर्थात् माता से साक्षात् और भार्या से पुत्ररूप धारण करके मनुष्य की उत्पत्ति होती है। इसलिये जाया हो या जनित्री (माता) हो, हे कृतज्ञ। उन दोनों (जाया और जनित्री) को निन्दा करने से तुम्हारा मंगल कहाँ से हो सकता है?।
स्त्री-पुरुष दोनों को व्युत्क्रम में (परस्त्री-गमन में पुरुष को तथा परपुरुष-गमन में ती को) समान दोष धर्मशास्त्र में कहा गया है; परन्तु पुरुष उस दोष को नहीं देखते तथा तो देखती है। इसलिये पुरुषों से लियाँ श्रेष्ठ हैं।
जो पुरुष अपनी स्त्री को छोड़कर परखी-गमन करता है, वह बाहर की तरफ किये हुये रोम वाले गदहे के चमड़े से अपने शरीर को इक कर छः मास तक 'भिक्षां देहि यह कहकर भीख माँगने से शुद्ध होता है।
सौ वर्ष व्यतीत होने पर भी मनुष्य की विषय-वासना नष्ट नहीं होतो; किन्तु शारीरिक शक्ति कम हो जाने पर ही पुरुष उससे निवृत्त होता है, लेकिन स्त्री धैर्य से निवृत्त होती
पवित्र लियों की निन्दा करते हुये दुर्जनों की पृष्टता, चोरी करते हुये चोर का 'चोर ठहर' ऐसा कहने की तरह ही है।
कामातुर मनुष्य एकान्त में खियों को जिस प्रकार मधुर वचन कहते हैं, उस प्रकार बाद में नहीं कहते; किन्तु स्त्री मृत पति का भी आलिङ्गन करते हुये अग्नि में प्रवेश कर जाती है।
जिस पुरुष को उत्तम ली का सम्भोग प्राप्त हो, वह दरिद्र होने पर भी राजा के समान है। क्योंकि राज्य का सार भोजन और खी- ये दो ही वस्तु होते हैं। शेष धन आदि तो तृष्णारूप अग्नि को प्रज्वलित करने वाले काष्ठमात्र ही होते हैं।
मन्द, सुन्दर, कोमल और पीड़ित शब्द करती हुई, ऊँचे स्तनों से युत नवयौवना स्त्री को आलिङ्गन करने से जो सुख प्राप्त होता है, वह ब्रह्मलोक में भी प्राप्त नहीं होता-ऐसा मेरा मत है।
देवता, मुनि, सिद्ध और चारण (नट, नर्तक, गीतज्ञ और वाद्यज्ञ) के द्वारा पूजनीय, पूजक और सेव्यों की उपासना के अतिरिक्त ब्रह्मलोक में और कौन-सा सुख है, जो एकान्त में स्त्री को आलिङ्गन करने से नहीं प्राप्त होता है।
ब्रह्मा से लेकर कोट पर्य्यन्त सारा संसार स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध से बंधा हुआ है। अतः इसमें क्या लज्जा? जहाँ महादेव जी भी युवती ( तिलोत्तमा) को देखने के लोभ से चतुर्मुखता को प्राप्त हुये ।
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