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बृहत्संहिता • अध्याय 74 • श्लोक 3
आकारं विनिगूहतां रिपुबलं जेतुं समुत्तिष्ठतां तन्त्रं चिन्तयतां कृताकृतशतव्यापारशाखाकुलम् । मन्त्रिप्रोक्तनिषेविणां क्षितिभुजामाशङ्किनां सर्वतो दुःखाम्भोनिधिवर्तिनां सुखलवः कान्तासमालिङ्गनम् ॥
सुख, भय, हर्ष आदि आकार को छिपाते हुये, शत्रु की सेना को जीतने के लिये प्रयत्न करते हुये, किये न किये सैकड़ों व्यापारों की शाखाओं से व्याकुल तन्त्रों को विचार करते हुये, मन्त्रियों द्वारा कथित नीति का सेवन करते हुये, पुत्र आदि से भी शङ्कित रहते हुये, दुःखार्णव में निमग्न राजाओं के लिये स्त्री का आलिङ्गन मात्र थोड़ा- सा ही सुख होता है।
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