स्त्री-पुरुष दोनों को व्युत्क्रम में (परस्त्री-गमन में पुरुष को तथा परपुरुष-गमन में ती को) समान दोष धर्मशास्त्र में कहा गया है; परन्तु पुरुष उस दोष को नहीं देखते तथा तो देखती है। इसलिये पुरुषों से लियाँ श्रेष्ठ हैं।
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