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बृहत्संहिता • अध्याय 74 • श्लोक 4
भुतं दृद्धं स्पृष्टं स्मृतमपि नृणां ह्लादजननं न रलं खीभ्योऽन्यत् क्वचिदपि कृतं लोकपतिना । तदद्ध धर्मार्थी सुतविषयसौख्यानि च ततो गृहे लक्ष्यो मान्याः सततमबला मानविधवैः ॥
संसार में कहीं पर भी बद्या ने लियों के अतिरिक्त ऐसा कोई रान नहीं बनाया, जिसके सुनने, स्पर्श करने, देखने या स्मरण करने से ही आनन्द प्राप्त हो सके। लोग की के लिये धर्म और अर्थ की सेवा करते हैं। स्त्री के द्वारा पुत्रसुख तथा विषयमुख मिलता है तथा स्त्री ही गृह में लक्ष्मी होती है। अतः मान तथा विषयों के द्वारा ती का सदा आदर करना चाहिये।
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