जिस पुरुष को उत्तम ली का सम्भोग प्राप्त हो, वह दरिद्र होने पर भी राजा के समान है। क्योंकि राज्य का सार भोजन और खी- ये दो ही वस्तु होते हैं। शेष धन आदि तो तृष्णारूप अग्नि को प्रज्वलित करने वाले काष्ठमात्र ही होते हैं।
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