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बृहत्संहिता • अध्याय 74 • श्लोक 2
रत्नानि विभूषयन्ति योषा भूष्यन्ते वनिता न रत्नलकान्या । चेतो वनिता हरन्त्यरत्ना नो रत्नानि विनाङ्गनाङ्गसङ्गम् ॥
खी रत्नों कोखी रत्नों को भूषित करती है; किन्तु रत्नकान्ति से खी नहीं भूषित होती; क्योंकि रत्नरहित खी भी चित्त को हर लेती है, किन्तु खी के अंग-संग के विना रत्न चित्त को नहीं हर सकता है।
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