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अध्याय 103 — अथ विवाहपटलाध्यायः
बृहत्संहिता
13 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि विवाहकालिक लग्न में सूर्य या मंगल बैठा हो तो विधवा, राहु हो तो नष्ट सन्तान वाली, शनि हो तो दरिद्र, शुक्र, बुध या गुरु बैठा हो तो साध्वी और चन्द्र हो तो नए आयु वाली स्त्री होती है।
यदि विवाहकाल में लग्न से द्वितीय भाव में सूर्य, शनि, राहु या मंगल बैठा हो तो सदा अतिशय दारिद्रय-दुःख से युतः गुरु, शुक्र या बुध हो तो धनवतो, वैपव्यरहित तथा चन्द्र हो तो अधिक सन्तान वाली रखी होती है।
यदि विवाहकाल में लग्न से तृतीय भाव में सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र या बुध हो तो अधिक सन्तान वाली और धन से युत, शनि हो तो कोर्ति से युत और सुभगा तथा राहु हो तो निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त करने वाली स्त्री होती है।
जिसके विवाहकाल में लग्न से चतुर्थ स्थान में शनि हो, उसके स्तनों से बहुत थोड़ा दूप निकलता है। सूर्य या चन्द्र हो तो भाग्यरहित, राहु हो तो सौत (सौतिन ) चाली, मंगल हो तो अल्प धन बाली तथा शुक्र, बृहस्पति या बुध हो तो सुख भोगने बालो खी होती है।
जिसके विवाहकाल में लग्न से पञ्चम स्थान में रवि या मंगल हो तो उसकी सन्तान मर जाती है। बुध, गुरु और शुक्र हो तो बहुत सन्तान, राहु हो तो मृत्यु, शनि हो तो कठोर रोग तथा चन्द्र हो तो शीघ्र ही कन्या का नाश करता है।
यदि विवाहकाल में लग्न से षष्ठ भाव में शनि, सूर्य, राहु, गुरु या मंगल हो श्वशुर कॉ सेवा करने वालो, चन्द्र हो तो विधवा, शुक्र हो तो निर्धन तथा युध हो तो धन से युत और कलहकारिणी खी होती है।
यदि विवाहकाल में लग्न से सप्तम भाव में शनि, मंगल, गुरु, बुध, राहु, सूर्य, चन्द्र या शुक्र हो तो क्रम से विधवा, बन्धन, विनाश, धननाश, व्याधि, प्रवास और मृत्यु करता है। जैसे कि सप्तम में शनि हो तो विधवा, मंगल हो तो बन्धन इत्यादि करता है।
यदि विवाहकाल में लग्न से अष्टम भाव में गुरु या बुध हो तो खो का पति से वियोग, चन्द्र, शुक्र या राहु हो तो मृत्यु, सूर्य हो तो सौभाग्यवती, मंगल हो तो रुग्णा तथा शनि हो तो धन से युत और पतिवत्तभा कराता है।
यदि विवाहकाल में लग्न से नवम स्थान में शुक्र, सूर्य, मंगल या गुरु हो तो लो को धर्म करने बाली, बुध हो तो नीरोग, राहु और शनि हो तो बन्ध्या तथा चन्द्र हो तो कन्या उत्पत्र करने वाली और घूमने वाली बनाता है।
यदि वैवाहिक लग्न से दशम भाव में राहु बैठा हो तो त्री को विधवा, सूर्य या शनि हो तो पाप करने वाली, मंगल हो तो मृत्यु, चन्द्र हो तो निर्धन और कुलटा तथा शेष ग्रह (बुध, गुरु और शुक्र) हो तो रत्री को धनवती और सुभगा करता है।
यदि चैवाहिक लग्न से एकादश भाव में रवि हो तो बहुत पुत्र वाली, चन्द्र हो तो धन से युत, मंगल हो तो पुत्र से युतं, शनि हो तो धनाढ्य, बृहस्पति हो हो बहुत दिन तक जोधित रहने वाली, बुध हो तो धन से पुत, राहु हो तो पतियुक्त और शुक्र हो तो धन से युत त्रो को करता है।
यदि वैवाहिक लग्न से द्वादश भाव में गुरु हो तो धनक्ती, सूर्य हो तो निर्धन, चन्द्र हो तो बहुत खर्च करने वाली, राहु हो तो कुलटा, शुक्र हो हो साच्यी, ग्रुप हो तो बहुत पुत्र वाली और शनि या मंगल हो तो मद्य आदि पान करने वाली खी को करता है।
दिनान्त (सायं सन्ध्या) में ग्वालों के द्वारा यष्टि से तादित गायों के खुरों से खण्डित भूति सुन्दरियों (त्रियों) के विवाह में अत्यधिक धन, पुत्र, आरोग्य और सौभाग्य को करने वाली होती है। उस गोधूलि समय में नक्षत्र, तिथि, करण, लग्न और योग का कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये। पुरुषों के मुख के लिये यह काल कहा गया है तथा उत्पन यह गायों की धूलि समस्त दुष्कृतों का नाश करने वाली होती है।
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