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बृहत्संहिता • अध्याय 103 • श्लोक 2
कुर्वन्ति भास्करशनैश्चरराहुभीमा दारिद्र्यदुः खमतुलं नियतं द्वितीये । वित्तेश्वरीमविधवां गुरुशुक्रसौम्या नारी प्रभूततनयां कुरुते शशाङ्कः ॥
यदि विवाहकाल में लग्न से द्वितीय भाव में सूर्य, शनि, राहु या मंगल बैठा हो तो सदा अतिशय दारिद्रय-दुःख से युतः गुरु, शुक्र या बुध हो तो धनवतो, वैपव्यरहित तथा चन्द्र हो तो अधिक सन्तान वाली रखी होती है।
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