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बृहत्संहिता • अध्याय 103 • श्लोक 1
मूर्ती राहुर्विपन्नतनयां करोति दिनकृद्विधवां रविजो दरिद्राम् । साध्वी- शुक्रः शशाङ्कतनयश्च गुरुश्च मायुः क्षयं प्रकुरुतेऽ थ विभावरीशः ॥
यदि विवाहकालिक लग्न में सूर्य या मंगल बैठा हो तो विधवा, राहु हो तो नष्ट सन्तान वाली, शनि हो तो दरिद्र, शुक्र, बुध या गुरु बैठा हो तो साध्वी और चन्द्र हो तो नए आयु वाली स्त्री होती है।
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