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बृहत्संहिता • अध्याय 103 • श्लोक 10
राहुर्नभः स्थलगतो पापे शनैश्चरश्च । रतां दिनकर च मृत्युं कुजोऽर्धरहितां कुलटां च चन्द्रः शेषा ग्रहा धनवतीं सुभगां च कुर्युः ॥
यदि वैवाहिक लग्न से दशम भाव में राहु बैठा हो तो त्री को विधवा, सूर्य या शनि हो तो पाप करने वाली, मंगल हो तो मृत्यु, चन्द्र हो तो निर्धन और कुलटा तथा शेष ग्रह (बुध, गुरु और शुक्र) हो तो रत्री को धनवती और सुभगा करता है।
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