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बृहत्संहिता • अध्याय 103 • श्लोक 12
अन्ते गुरुर्धनवतीं दिनकृद्दरिद्रां चन्द्रो धनव्ययकरों कुलटां च राह साध्वी भृगुः शशिसुतो बहुपुत्रपौत्रां पानप्रस्रक्तहृदयां रविजः कुजच ॥
यदि वैवाहिक लग्न से द्वादश भाव में गुरु हो तो धनक्ती, सूर्य हो तो निर्धन, चन्द्र हो तो बहुत खर्च करने वाली, राहु हो तो कुलटा, शुक्र हो हो साच्यी, ग्रुप हो तो बहुत पुत्र वाली और शनि या मंगल हो तो मद्य आदि पान करने वाली खी को करता है।
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