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बृहत्संहिता • अध्याय 103 • श्लोक 7
सौरारजीवबुधराहुरवीन्दुशुक्रा कुर्युः प्रसह्य खलु सप्तमराशिसंस्थाः। वैधव्यबन्धनवधक्षयमर्थनाश- व्याधिप्रवासमरणानि यथाक्रमेण ॥
यदि विवाहकाल में लग्न से सप्तम भाव में शनि, मंगल, गुरु, बुध, राहु, सूर्य, चन्द्र या शुक्र हो तो क्रम से विधवा, बन्धन, विनाश, धननाश, व्याधि, प्रवास और मृत्यु करता है। जैसे कि सप्तम में शनि हो तो विधवा, मंगल हो तो बन्धन इत्यादि करता है।
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