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बृहत्संहिता • अध्याय 103 • श्लोक 13
गोपैर्यश्याहतानां खुरपुटदलिता या तु धूलिर्दिनान्ते सोद्वाहे सुन्दरीणां विपुलधनसुतारोग्यसौभाग्यकत्रों। तस्मिन् काले न चर्क्ष न च तियिकरणं नैव लग्नं न योगः ख्यातः पुंसां सुखार्थ शमयति दुरितान्युत्थितं गोरजस्तु ॥
दिनान्त (सायं सन्ध्या) में ग्वालों के द्वारा यष्टि से तादित गायों के खुरों से खण्डित भूति सुन्दरियों (त्रियों) के विवाह में अत्यधिक धन, पुत्र, आरोग्य और सौभाग्य को करने वाली होती है। उस गोधूलि समय में नक्षत्र, तिथि, करण, लग्न और योग का कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये। पुरुषों के मुख के लिये यह काल कहा गया है तथा उत्पन यह गायों की धूलि समस्त दुष्कृतों का नाश करने वाली होती है।
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