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अध्याय 1 — प्रथमः प्रश्नः
प्रश्न
16 श्लोक • केवल अनुवाद
ॐ
परमात्मा
को नमस्कार। हरिः ॐ।
सुकेशा
(भारद्वाज)
,
शैब्य
,
सत्यकाम
(सौर्यायणी)
,
गार्ग्य
(सौर्यायणी का पुत्र)
,
कौसल्य
(अश्वलायन)
,
भार्गव
(विदर्भ देश का)
, और
कबन्धी कात्यायन
—ये सभी
ब्रह्म में परायण
,
ब्रह्मनिष्ठ
और
परब्रह्म के अन्वेषक
थे। वे सोचते थे कि
भगवान् पिप्पलाद
उन्हें यह समस्त
ब्रह्मविद्या
का उपदेश देंगे; अतः वे
समिधा हाथ में लेकर
उनके पास पहुँचे।
उन
शिष्यों
से
ऋषि पिप्पलाद
ने कहा— “तुम सभी
पुनः एक वर्ष तक
तप
(संयम)
,
ब्रह्मचर्य
और
श्रद्धा
के साथ यहाँ निवास करो। उसके बाद तुम अपनी-अपनी
इच्छानुसार प्रश्न पूछना
। यदि हम उन्हें जान पाएँगे, तो हम तुम सबको
सम्पूर्ण उत्तर
देंगे।”
तब
कबन्धी कात्यायन
समीप जाकर पूछने लगा—
“हे भगवन्!
यह
समस्त प्रजा
कहाँ से उत्पन्न होती है?”
उसके उत्तर में ऋषि ने कहा—
प्रजाओं की इच्छा
करने वाले
प्रजापति
ने
तप
किया। तपस्या करके उन्होंने
दो तत्त्वों का निर्माण
किया—
रयि
(पदार्थ/अन्न/स्थूल सत्ता)
और
प्राण
(जीवनी शक्ति/चैतन्य प्रवाह)
। उन्होंने विचार किया—
“ये दोनों मिलकर अनेक प्रकार की प्रजा की वृद्धि करेंगे।”
आदित्य
(सूर्य)
ही वास्तव में
प्राण
है, और
चन्द्रमा
ही
रयि
(पदार्थ/अन्न/स्थूल सत्ता)
है। यह
रयि
ही वह सब कुछ है जो
मूर्त
(स्थूल)
और
अमूर्त
(सूक्ष्म)
रूप में विद्यमान है; इसलिए
मूर्ति
को ही
रयि
कहा गया है।
अब
सूर्य
जब उदय होकर
पूर्व दिशा
में प्रविष्ट होता है, तो वह अपनी
किरणों
के माध्यम से
पूर्व दिशा के प्राणों
को प्रकाशित और स्थित करता है। इसी प्रकार जब वह
दक्षिण
,
पश्चिम
,
उत्तर
,
नीचे
,
ऊपर
और
समस्त मध्य दिशाओं
को प्रकाशित करता है, तो वह अपनी
किरणों
के माध्यम से
सभी प्राणों
को स्थापित और प्रकाशित करता है।
वह
सूर्यरूप वैश्वानर
है, जो
समस्त रूपों वाला
है, और वही
प्राणस्वरूप अग्नि
होकर उदित होता है। इसके विषय में यह
ऋचा
(वेद-मंत्र)
कही गई है।
यह
सूर्य
विश्व के समस्त रूपों वाला
,
हरितवर्ण
(ऊर्जा-धारी/जीवनदायी)
,
जातवेदस
(सर्वज्ञ)
,
परायण
(परम आश्रय)
और
एकमात्र तेजस्वी ज्योति
है जो
तपता हुआ प्रकाशित
रहता है। यह
सहस्रों किरणों वाला
, अनेक प्रकार से प्रवृत्त होकर
प्रजाओं का प्राण
बनकर उदय होता है—यही
सूर्य
है।
संवत्सर
(पूरा वर्ष)
ही वास्तव में
प्रजापति
(सृष्टि का नियामक)
है, जिसके दो
अयन
(मार्ग)
होते हैं—
दक्षिण
और
उत्तर
। जो लोग केवल
इष्ट
और
पूर्त
(कर्मकाण्डीय पुण्यकर्म)
को ही साध्य मानकर उसकी उपासना करते हैं, वे
चन्द्रलोक
को प्राप्त करते हैं, किन्तु वहाँ से वे
पुनः संसार में लौट आते हैं
। इसीलिए
प्रजाओं
(संतान)
की कामना करने वाले ऋषि
दक्षिणायन मार्ग
का अनुसरण करते हैं। यह
पितृयाण मार्ग
है, जो
रयि
(स्थूल फल/भोग)
से सम्बद्ध माना गया है।
किन्तु जो लोग
उत्तरायण मार्ग
का अनुसरण करते हैं, वे
तप
,
ब्रह्मचर्य
,
श्रद्धा
और
विद्या
के द्वारा
आत्मा का अन्वेषण
करते हुए
आदित्यलोक
को प्राप्त करते हैं। वह
लोक
ही
प्राणों का आश्रय
है, वही
अमृत
है, वही
अभय
है और वही
परम गति
है। वहाँ पहुँचकर
पुनः संसार में लौटना नहीं होता
—यही
मोक्ष का निरोध
है। इस विषय में यह
श्लोक
कहा गया है।
कुछ लोग
कालस्वरूप संवत्सर
को
पाँच पादों वाला
,
बारह आकृतियों वाला
और
आकाश के उच्च अर्धभाग में स्थित
मानते हैं। अन्य लोग उसे
दिव्य चक्र
(सप्तचक्र)
में स्थित,
छः अरों वाला
और
सर्वत्र प्रतिष्ठित
कहते हैं—जहाँ यह सम्पूर्ण जगत् उसी में
आरोपित
है।
मास
ही वास्तव में
प्रजापति
है। उसका
कृष्णपक्ष
रयि
(स्थूल, भौतिक पक्ष)
है और
शुक्लपक्ष
प्राण
(चैतन्य/ऊर्जात्मक पक्ष)
है। इसलिए
ऋषि
लोग
शुक्लपक्ष
में
इष्टकर्म
करते हैं, और अन्य लोग
कृष्णपक्ष
में भिन्न प्रकार के कर्म करते हैं।
अहोरात्र
(दिन और रात)
ही वास्तव में
प्रजापति
है। उसका
दिन
प्राण
(चेतना/ऊर्जा)
है और
रात्रि
रयि
(स्थूल, भौतिक पक्ष)
है। जो लोग
दिन में कामवासना में प्रवृत्त होते हैं
, वे अपने
प्राण का क्षय
करते हैं; और जो लोग
रात्रि में संयमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं
, वे वास्तव में
ब्रह्मचर्य
का आचरण करते हैं।
अन्न
ही वास्तव में
प्रजापति
है। उसी से उत्पन्न होकर वह
रेतस्
(बीज/सृजन-तत्त्व)
बनता है, और उसी से ये
समस्त प्रजाएँ
उत्पन्न होती हैं।
जो लोग वास्तव में उस
प्रजापति-व्रत
(सृष्टि-नियमन एवं संयम का मार्ग)
का आचरण करते हैं, वे
सृष्टि-सामर्थ्य
(मिथुन-उत्पत्ति)
को प्राप्त करते हैं। किन्तु उनका वास्तविक
ब्रह्मलोक
वही है, जिनमें
तप
,
ब्रह्मचर्य
और
सत्य
दृढ़ रूप से प्रतिष्ठित होते हैं।
उनका वह
ब्रह्मलोक
(परम शुद्ध अवस्था)
विरज
(रजोगुण से रहित)
होता है, जहाँ न तो
कुटिलता
(जिह्मता)
होती है, न
असत्य
, और न ही
माया
(छल या भ्रम)
।
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