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प्रश्न • अध्याय 1 • श्लोक 16
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥
उनका वह ब्रह्मलोक (परम शुद्ध अवस्था) विरज (रजोगुण से रहित) होता है, जहाँ न तो कुटिलता (जिह्मता) होती है, न असत्य, और न ही माया (छल या भ्रम)
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