तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥
उनका वह ब्रह्मलोक(परम शुद्ध अवस्था)विरज(रजोगुण से रहित) होता है, जहाँ न तो कुटिलता(जिह्मता) होती है, न असत्य, और न ही माया(छल या भ्रम)।
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