संवत्सर(पूरा वर्ष) ही वास्तव में प्रजापति(सृष्टि का नियामक) है, जिसके दो अयन(मार्ग) होते हैं—दक्षिण और उत्तर।
जो लोग केवल इष्ट और पूर्त(कर्मकाण्डीय पुण्यकर्म) को ही साध्य मानकर उसकी उपासना करते हैं, वे चन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं, किन्तु वहाँ से वे पुनः संसार में लौट आते हैं।
इसीलिए प्रजाओं(संतान)की कामना करने वाले ऋषिदक्षिणायन मार्ग का अनुसरण करते हैं। यह पितृयाण मार्ग है, जो रयि(स्थूल फल/भोग) से सम्बद्ध माना गया है।
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