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प्रश्न • अध्याय 1 • श्लोक 9
संवत्सरो वै प्रजापतिः स्तस्यायने दक्षिणञ्चोत्तरं च। तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते त एव पुनरावर्तन्ते। तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥
संवत्सर (पूरा वर्ष) ही वास्तव में प्रजापति (सृष्टि का नियामक) है, जिसके दो अयन (मार्ग) होते हैं—दक्षिण और उत्तर। जो लोग केवल इष्ट और पूर्त (कर्मकाण्डीय पुण्यकर्म) को ही साध्य मानकर उसकी उपासना करते हैं, वे चन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं, किन्तु वहाँ से वे पुनः संसार में लौट आते हैं। इसीलिए प्रजाओं (संतान) की कामना करने वाले ऋषि दक्षिणायन मार्ग का अनुसरण करते हैं। यह पितृयाण मार्ग है, जो रयि (स्थूल फल/भोग) से सम्बद्ध माना गया है।
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