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प्रश्न • अध्याय 1 • श्लोक 10
अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्‌ परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः। तदेष श्लोकः ॥
किन्तु जो लोग उत्तरायण मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या के द्वारा आत्मा का अन्वेषण करते हुए आदित्यलोक को प्राप्त करते हैं। वह लोक ही प्राणों का आश्रय है, वही अमृत है, वही अभय है और वही परम गति है। वहाँ पहुँचकर पुनः संसार में लौटना नहीं होता—यही मोक्ष का निरोध है। इस विषय में यह श्लोक कहा गया है।
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