लेकिन जो लोग तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और ज्ञान (विद्या) के द्वारा अपने आत्मा की खोज करते हैं, वे उत्तरायण मार्ग से सूर्य (आदित्य) को प्राप्त होते हैं।
यह (सूर्य) ही सभी प्राणों का आधार है, यह अमृत (अमरता) है, यह निर्भय अवस्था है, और यही परम लक्ष्य है।
जो यहाँ पहुँच जाते हैं, वे फिर कभी जन्म-मरण के चक्र में नहीं लौटते—यही पूर्ण मुक्ति (निरोध) है।
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