तस्मै स होवाच — प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते — रयिं च प्राणञ्चेति। एतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥
उनसे ऋषि ने कहा—
प्रजापति (सृष्टिकर्ता) ने सृष्टि की इच्छा की। उसने तप (गंभीर साधना) किया।
तप करने के बाद उसने एक जोड़ी (मिथुन) उत्पन्न की—रयि (पदार्थ/भौतिक तत्व) और प्राण (जीवन शक्ति)।
और उसने सोचा—
“ये दोनों मिलकर मेरी सृष्टि को अनेक रूपों में उत्पन्न करेंगे।”
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