कुछ लोग कालस्वरूप संवत्सर को पाँच पादों वाला, बारह आकृतियों वाला और आकाश के उच्च अर्धभाग में स्थित मानते हैं।
अन्य लोग उसे दिव्य चक्र(सप्तचक्र) में स्थित, छः अरों वाला और सर्वत्र प्रतिष्ठित कहते हैं—जहाँ यह सम्पूर्ण जगत् उसी में आरोपित है।
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