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अध्याय 5 — मनिनिग्रह
प्रबोधसुधाकर
13 श्लोक • केवल अनुवाद
अपने उद्गम स्थान (निकास की जगह) से निकलकर नीचे मार्ग से बहने वाली नदी समुद्र में जा मिलती है, वह यदि उद्गम स्थान पर स्थिर रहती तो क्या बढ़कर स्वयं ही समुद्र न बन जाती?
इसी प्रकार यदि मन भी अपने कारण का विचार करता हुआ अपने आप में ही स्थिर हो जाय और बहिर्विषयों में न जाय तो क्या वह स्वयं ही आत्मा न हो जायगा?
कुओं और बड़े-बड़े झरनों में वर्षाऋतु में अधिक जल इकट्टा हो जाने से वह खारा हो जाता है, किन्तु ग्रीष्मऋतु में सूखकर अल्प परिमाण में रह जाने पर उनका जल मीठा हो जाता है।
उसी प्रकार विषय-वासनाओं से भरा हुआ चित्त तमोगुणी और पापमय होता है, वैराग्य द्वारा उसी के सूख जाने पर उसमें धीरे-धीरे सत्त्वगुण का आविर्भाव हो जाता है।
जिस विषय की अभिलाषा से यह चित्त किसी बाह्येन्द्रिय द्वारा दौड़ता है उसके न मिलने पर ऐसा दुखी होता है मानो इसका कुछ खो गया हो।
अपने अभीष्ट विषय की खोज में पर्वत, नगर, दुर्ग और दुर्गम नदियों में सब ओर भटकता हुआ चित्त यदि उस विषय को नहीं पाता तो विवश-सा होकर खिन्न हो जाता है।
तुम्बी फल को बड़े वेग ये भी जल में फेंका जाय तो भी वह तुरन्त जल के ऊपर ही आ जाता है, इसी प्रकार अपने स्वरूप में यत्न-पूर्वक लगाने पर भी चित्त पुनः पुनः बाहर निकल जाता है।
इस जन्म के अथवा पूर्वजन्म के कर्मो से उपार्जित जैसे-जैसे शुभ अथवा अशुभ फल होने होते हैं, उनके भोग भी बिना माँगे उपस्थित हो जाते हैं।
कुमार्ग की ओर दौड़ते हुए चित्तरूपी पशु को रोकने के लिये विधाता ने एकमात्र वैराग्य को ही गर्दन का उचित काष्ठ बनाया।
निद्रा के समय जो सुख होता है क्या वह विषयजन्य होता है? (कदापि नहीं) क्योंकि चित्त का इन्द्रिय-गोलकों में न रहना ही तो निद्रा है।
बिना द्वार के ऊँचे परकोटे वाले घर में बंद किया हुआ सिंह बाहर निकलने के बहुत-से प्रयत्न करने पर अन्त में थककर लम्बे-लम्बे श्वास लेता हुआ जैसे पड़ा रहता है,
उसी प्रकार समस्त इन्द्रियों के रोक देने पर सैकड़ों उपायों से भी बाहर निकलना असम्भव जानकर चित्त शान्त होकर स्थिर हो जाता है और फिर धूम-धाम नहीं करता।
प्राण-स्पन्दन के रोक देने से, सत्संग से, वासनाओं के त्याग से और भगवत्चरणारविन्दों की भक्ति से मन धीरे-धीरे अपने वेग को छोड़ देता है।
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