एवं मनः स्वहेतुं विचारयत्सुस्थिरं भवेदन्तः ।
न बहिर्वोदेति तदा किं नात्मत्वं स्वयं याति ॥
इसी प्रकार यदि मन भी अपने कारण का विचार करता हुआ अपने आप में ही स्थिर हो जाय और बहिर्विषयों में न जाय तो क्या वह स्वयं ही आत्मा न हो जायगा?
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