मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
प्रबोधसुधाकर • अध्याय 5 • श्लोक 3
वर्षास्वम्भःप्रचयात्कूपे गुरुनिर्झरे पयः क्षारम् । ग्रीष्मेणैव तु शुष्के माधुर्यं भजति तत्राम्भः ॥
कुओं और बड़े-बड़े झरनों में वर्षाऋतु में अधिक जल इकट्टा हो जाने से वह खारा हो जाता है, किन्तु ग्रीष्मऋतु में सूखकर अल्प परिमाण में रह जाने पर उनका जल मीठा हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
प्रबोधसुधाकर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

प्रबोधसुधाकर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें