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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 5 • श्लोक 11
अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरुद्धो यथा व्याघ्रः । बहुनिर्गमप्रयत्नैः श्रान्तस्तिष्ठति पतञ्श्वसंश्च तथा ॥
बिना द्वार के ऊँचे परकोटे वाले घर में बंद किया हुआ सिंह बाहर निकलने के बहुत-से प्रयत्न करने पर अन्त में थककर लम्बे-लम्बे श्वास लेता हुआ जैसे पड़ा रहता है,
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