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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 5 • श्लोक 9
चेतःपशुमशुभपथं प्रधावमानं निराकर्तुम् । वैराग्यमेकमुचितं गलकाष्ठं निर्मितं धात्रा ॥
कुमार्ग की ओर दौड़ते हुए चित्तरूपी पशु को रोकने के लिये विधाता ने एकमात्र वैराग्य को ही गर्दन का उचित काष्ठ बनाया।
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