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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 5 • श्लोक 1
स्वीयोद्गमतोयवहा सागरमुपयाति नीचमार्गेण । सा चेदुद्गम एव स्थिरा सती किं न याति वार्धित्वम् ॥
अपने उद्गम स्थान (निकास की जगह) से निकलकर नीचे मार्ग से बहने वाली नदी समुद्र में जा मिलती है, वह यदि उद्गम स्थान पर स्थिर रहती तो क्या बढ़कर स्वयं ही समुद्र न बन जाती?
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