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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 5 • श्लोक 7
तुम्बीफ्लं जलान्तर्बलादधः क्षिप्तमप्युपैत्यूर्ध्वम् । तद्वन्मनः स्वरूपे निहितं यत्नाद्बहिर्याति ॥
तुम्बी फल को बड़े वेग ये भी जल में फेंका जाय तो भी वह तुरन्त जल के ऊपर ही आ जाता है, इसी प्रकार अपने स्वरूप में यत्न-पूर्वक लगाने पर भी चित्त पुनः पुनः बाहर निकल जाता है।
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