अपने अभीष्ट विषय की खोज में पर्वत, नगर, दुर्ग और दुर्गम नदियों में सब ओर भटकता हुआ चित्त यदि उस विषय को नहीं पाता तो विवश-सा होकर खिन्न हो जाता है।
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