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अध्याय 59 — अथ वनसम्प्रवेशाध्यायः

बृहत्संहिता
15 श्लोक • केवल अनुवाद
प्रतिमा बनाने वाले को चाहिये कि अनुकूल दिन में, दैवज्ञ के द्वारा विशोधित मुहूर्त में, यात्रा प्रकरण में विहित शुभ शकुन को देख कर प्रतिमा बनाने हेतु लकड़ी लाने के लिये वन में प्रवेश करे।
श्मशान के मार्ग, देवालय, वल्मीक, उपवन और तपस्वियों के आश्रम में उत्पन्न, चैत्य (प्रधान), नदियों के संगम-स्थान में उत्पन्न, घड़ों के जल से सिञ्चित,
कुबड़े अन्य वृक्षों के संयोग से पीड़ित, लताओं से पीड़ित, बिजली से भग्न, वायु से भग्न, हाथियों से भग्न, सूखे, अग्नि से दग्ध और मधुमक्खियों के छत्ते वाले वृक्षों का
( प्रतिमा-निर्माण हेतु लकड़ी के इच्छुक व्यक्ति द्वारा) त्याग कर देना चाहिये। स्निग्ध पत्ते, फूल और फल वाले वृक्ष शुभ होते हैं। इस प्रकार अभीष्ट वृक्ष के पास जाकर बलि और पुष्यों के द्वारा सर्वप्रथम उस वृक्ष की पूजा करनी चाहिये।
( प्रतिमा-निर्माण हेतु लकड़ी के इच्छुक व्यक्ति द्वारा) त्याग कर देना चाहिये। स्निग्ध पत्ते, फूल और फल वाले वृक्ष शुभ होते हैं। इस प्रकार अभीष्ट वृक्ष के पास जाकर बलि और पुष्यों के द्वारा सर्वप्रथम उस वृक्ष की पूजा करनी चाहिये।
देवदारू, चन्दन, शमी और महुआ के वृक्ष ब्राह्मणों के लिये; निम्ब, पीपल, खैर और बेल के वृक्ष क्षत्रियों के लिये; जीवक, खैर,
सिन्धुक और स्यन्दन के वृक्ष वैश्यों के लिये तथा तेन्दू, नागकेसर, सर्ज, अर्जुन और साल के वृक्ष शूद्रों के लिये शुभदायक कहे गये हैं।
वृक्ष की दिशाओं की तरह शिवलिङ्ग या प्रतिमा को स्थापित करना चाहिये तथा वृक्ष के ऊर्ध्व भाग से प्रतिमा का ऊर्ध्व भाग और वृक्ष के अधोभाग से प्रतिमा का अधोभाग बनाना चाहिये। अतः अभीष्ट वृक्ष को काटने से पहले ही उसमें सभी दिशाओं का चिह्न लगा देना चाहिये।
खीर, लडू, भात, दही, मांस, उल्लोपिका (एक प्रकार की भोज्य वस्तु) आदि मक्ष्य वस्तुयें, पुष्प और सुगन्ध द्रव्यों से वृक्ष की पूजा करने के उपरान्त रात्रि में देवता
पितर, पिशाच, राक्षस, नाग, सुरगण, गणेश आदि (भूत, प्रेत, सिद्ध, विद्याधर और गन्धर्व) की पूजा करने के पश्चात् वृक्ष को स्पर्श करके वक्ष्यमाण मन्त्र का पाठ करना चाहिये।
हे वृक्ष! अमुक देवता की पूजा के लिये कल्पित किये हुये आपको मैं नमस्कार करता हूँ, मेरे द्वारा की गई विधिपूर्वक इस पूजा को आप ग्रहण करें तथा इस वृक्ष पर जो प्राणी निवास करते हैं,
वे सब विधिपूर्वक इस पूजा को ग्रहण करके कहीं अन्यत्र अपना निवासस्थान कल्पित करें, आज वे सब मुझे क्षमा करें, उनको मैं नमस्कार करता हूँ।
इसके पश्चात् प्रातःकाल जल से वृक्ष को सींच कर शहद और घृत से चुपड़े हुए कुठार से पहले ईशान कोण में काट कर शेष को प्रदक्षिण क्रम से काटे।
यदि कटा हुआ वृक्ष पूरब, ईशान कोण या उत्तर दिशा में गिरे तो वृद्धि करने वाला होता है। अग्निकोण आदि पाँच दिशाओं में कटे हुये वृक्ष के गिरने से क्रमशः अग्निदाह, रोग, रोग, रोग और घोड़े का नाश होता है अर्थात् अग्निकोण में अग्निदाह, दक्षिण में रोग, नैऋत्य कोण में रोग, पश्चिम में रोग और वायव्य कोण में यदि वृक्ष गिरता है तो घोड़े का नाश होता है।
इस वनसम्प्रवेश नामक अध्याय में वृक्ष के निपात, विच्छेदन, वृक्षगर्भ आदि जो मैंने नहीं कहे हैं, उनको पूर्वकथित इन्द्रध्वजाध्याय और वास्तुविद्याध्याय में कथित ऐति की तरह समझना चाहिये ।
Krishjan
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