इस वनसम्प्रवेश नामक अध्याय में वृक्ष के निपात, विच्छेदन, वृक्षगर्भ आदि जो मैंने नहीं कहे हैं, उनको पूर्वकथित इन्द्रध्वजाध्याय और वास्तुविद्याध्याय में कथित ऐति की तरह समझना चाहिये ।
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