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बृहत्संहिता • अध्याय 59 • श्लोक 14
पूर्वेण पूर्वोत्तरतोऽथवोदक् पतेयदा वृद्धिकरस्तदा स्यात् । आग्नेयकोणात् क्रमशोऽग्निदाहरुप्रागरोगास्तुरगक्षयश्च ॥
यदि कटा हुआ वृक्ष पूरब, ईशान कोण या उत्तर दिशा में गिरे तो वृद्धि करने वाला होता है। अग्निकोण आदि पाँच दिशाओं में कटे हुये वृक्ष के गिरने से क्रमशः अग्निदाह, रोग, रोग, रोग और घोड़े का नाश होता है अर्थात् अग्निकोण में अग्निदाह, दक्षिण में रोग, नैऋत्य कोण में रोग, पश्चिम में रोग और वायव्य कोण में यदि वृक्ष गिरता है तो घोड़े का नाश होता है।
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