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अध्याय 105 — अथ रूपसत्राध्यायः

बृहत्संहिता
13 श्लोक • केवल अनुवाद
नक्षत्रपुरुष के दोनों पाँव में मूल, दोनों जङ्घाओं में रोहिणी, दोनों जानुओं में अश्विनी, दोनों ऊरुओं में पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा,
गुह्य ( लिङ्ग और गुदा) में पूर्वफाल्गुनी और उत्तरफाल्गुनी, कमर में कृत्तिका, दोनों पार्श्व में पूर्वभाद्रपदा और उत्तरभाद्रपदा
पेट में रेवती, छाती में अनुराधा, पीठ में धनिष्ठा, दोनों भुजाओं में विशाखा, दोनों हाथों में हस्त, अंगुलियों में पुनर्वसु, नखों में आश्लेषा, ग्रीवा में ज्येष्ठा
दाँतों में स्वाति, हास्य में शतभिषा, नासिका में मघा, दोनों आँखों में मृगशिरा, ललाट में
चित्रा, शिर में भरणी तथा केशों में आर्द्रा को स्थापित करना चाहिये। सुन्दर रूप की इच्छा करने वाले पुरुषों को यह नक्षत्रचक्र बनाना चाहिये।
चैत्र शुक्ल अष्टमी में यदि मूल नक्षत्र और चन्द्रवार हो तो उस दिन विष्णु और नक्षत्र की पूजा करके प्रथम उपवास प्रारम्भ करके जैसे-जैसे रोहिणी आदि आता जाय वैसे-वैसे आर्दा तक उपवास करना चाहिये।
व्रत समाप्त होने के बाद अपनी शक्ति के अनुसार कालज्ञ ब्राह्मण के लिये सुवर्ण, रत्न और वस्त्रों के साथ घृत से पूर्ण पात्र दान करना चाहिये।
लावण्य की इच्छा करने वाले मनुष्य को चाहिये कि दूध, घृत और गुड़ से मिश्रित अन्नों से ब्राह्मणों की पूजा करे तथा उन ब्राह्मणों को सोना, वत्र और चाँदी प्रदान करें। पाँव के नक्षत्र से आरम्भ करके उपवास करता हुआ विष्णु और अंग के नक्षत्रों को पूजा करे ।
पूर्वकथित पूजा करने से मनुष्य लम्बी भुजाओं से युत, विस्तीर्ण और पुष्ट छाती वाला, चन्द्र के समान मुख वाला, सफेद-सुन्दर दाँतों से युत, गजेन्द्र के समान गति वाला, कमल के समान विस्तीर्ण नेत्र वाला, स्त्रो के चित्त को हरण करने चाला और कामदेन के समान स्वरूप वाला होता है।
यदि पूर्वोक्त व्रत को स्त्री करे तो शारदीय चन्द्र के समान मुखकान्ति, कमलदल के समान नेत्र, सुन्दर दाँत, सुन्दर कान, भ्रमरोदर के समान केश
पुंस्कोकिल के समान वाणी, ताम्र वर्ण के समान ओंठ, कमल के समान हाश और पाँव, स्तनों के भार से नत मध्य भाग, दक्षिणावर्त नाभियों से युत
केले के खम्भे के समान ऊरु, सुन्दर नितम्बकूप, स्वामिप्रिया और मिली हुई अँगुलियों से युत पाँव वाली होती है। इसी तरह इस व्रत को करने से पुरुष भी होता है।
इस लोक में अपनी कान्ति से शोभा उत्पन्न करती हुई नक्षत्रमाला जब तक आकाश में रहती है, तब तक क्षेत्री या पुरुष नक्षत्ररूप होकर नक्षत्रों के समान कल्पान्त तक विचरण करते हैं। तत्पश्चात् वह पुरुष दूसरे कल्प के आदि में बुद्धिमान चक्रवतीं राजां होता है और चक्रवर्त्तित्व नष्ट होने के पश्चात् संसार में जन्म लेकर राजा या धनाढ्य ब्राह्मण होता है।
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