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बृहत्संहिता • अध्याय 105 • श्लोक 13
यावन्नक्षत्रमाला विचरति गगने भूषयन्तीह भासा तावन्नक्षत्रभूतो विचरति सह तैर्ब्रह्मणोऽह्नोऽवशेषम् । कल्पादौ चक्रवर्ती भवति हि मतिमांस्तत्क्षयाच्चापि भूयः संसारे जायमानो भवति नरपतिर्बाह्मणो वा धनाढ्यः ॥
इस लोक में अपनी कान्ति से शोभा उत्पन्न करती हुई नक्षत्रमाला जब तक आकाश में रहती है, तब तक क्षेत्री या पुरुष नक्षत्ररूप होकर नक्षत्रों के समान कल्पान्त तक विचरण करते हैं। तत्पश्चात् वह पुरुष दूसरे कल्प के आदि में बुद्धिमान चक्रवतीं राजां होता है और चक्रवर्त्तित्व नष्ट होने के पश्चात् संसार में जन्म लेकर राजा या धनाढ्य ब्राह्मण होता है।
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