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बृहत्संहिता • अध्याय 105 • श्लोक 12
कदलीकाण्डनिभोरु सुश्रोणी वरकुकुन्दरा सुभगा । सुश्लिष्टाङ्गुलिपादा भवति प्रमदा मनुष्यश्च ॥
केले के खम्भे के समान ऊरु, सुन्दर नितम्बकूप, स्वामिप्रिया और मिली हुई अँगुलियों से युत पाँव वाली होती है। इसी तरह इस व्रत को करने से पुरुष भी होता है।
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